गाँव की आवाज़

 क्या डोडा-पोस्त पर पाबंदी ने ही खोल दिए 'सिंथेटिक मौत' के दरवाजे? : एक कड़वा सच


​(भारत की नशा विरोधी नीतियों पर एक सीधा सवाल)

​आज हमारे देश के गांवों और शहरों में एक भयानक मंजर आम हो गया है—नौजवानों की लाशें जो पार्कों या सुनसान जगहों पर मिलती हैं, जिनकी बांह में सुई (Syringe) लगी होती है। यह वह पीढ़ी है जो 'चिट्टा', 'स्मैक' और 'सिंथेटिक ड्रग्स' की भेंट चढ़ रही है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि यह दानव हमारे समाज में इतना हावी कैसे हुआ?

​इसकी जड़ें उस फैसले में छिपी हैं, जब सरकार ने बिना दूरगामी परिणाम सोचे 'डोडा-पोस्त' (अफीम की भूसी) जैसे पारंपरिक पदार्थों पर पूर्ण प्रतिबंध (Total Ban) लगा दिया।

​1. मच्छर मारने के चक्कर में सांप पाल लिए

​सालों से हमारे देश का किसान और मजदूर, जो कड़ाके की ठंड और तपती धूप में हाड़-तोड़ मेहनत करता था, वह थकान मिटाने और काम करने की क्षमता बनाए रखने के लिए अफीम या डोडा का सेवन करता था। यह नशा नहीं, उनकी 'खुराक' थी।

​बुजुर्गों का तर्क और प्रमाण हमारे सामने है—डोडा खाने वाला व्यक्ति 80-90 साल की उम्र तक खेतों में हल चलाता था। उसे न लिवर की बीमारी होती थी, न किडनी की। लेकिन सरकार ने इसे 'नशा' मानकर बंद कर दिया। नतीजा? वह जगह खाली नहीं रही, उसे सिंथेटिक ड्रग्स ने भर दिया। जो लोग पहले शांत रहते थे, आज वे केमिकल वाला नशा करके अपराधी बन रहे हैं।

​2. इलाज के नाम पर 'केमिकल नशा' (The Pharma Trap)

​सबसे बड़ी विडंबना (Irony) यह है कि डोडा छुड़वाने के लिए सरकार ने जो 'नशा मुक्ति केंद्र' खोले, वहां Buprenorphine (ब्यूप्रेनॉर्फिन) जैसी गोलियां दी जाने लगीं।

​हकीकत यह है कि नशा करने वालों ने डोडा तो छोड़ दिया, लेकिन वे इन गोलियों के गुलाम बन गए। जो गोली पेट में जानी चाहिए थी, उसे आज युवा पीसकर इंजेक्शन के जरिये नसों में उतार रहे हैं। इससे शरीर में गैंग्रीन हो रहा है, अंग गल रहे हैं और 2-3 साल में दर्दनाक मौत हो रही है।

​सवाल यह है कि डोडा बुरा था तो यह गोलियां अच्छी कैसे हो गईं? क्या सिर्फ इसलिए कि डोडा किसान के खेत से आता था और यह गोलियां बड़ी-बड़ी फार्मा कंपनियों की फैक्ट्रियों से आती हैं?

​3. शराब बनाम अफीम: दोहरा मापदंड

​शराब, जो घर बर्बाद करती है, एक्सीडेंट करवाती है और हिंसा को जन्म देती है—वह 'लीगल' है और सरकारी ठेकों पर बिकती है। क्यों? क्योंकि उससे सरकार को भारी टैक्स (Tax) मिलता है।

​वहीं, अफीम/डोडा खाने वाला व्यक्ति शांत रहता है, अपने काम से मतलब रखता है और किसी से झगड़ा नहीं करता। लेकिन वह 'गैरकानूनी' है। यह नीति समाज कल्याण के लिए है या केवल राजस्व (Revenue) और कंपनियों के मुनाफे के लिए?

​4. पैसा: किसान से कॉर्पोरेट की जेब में

​डोडा पर बैन लगाने का सीधा आर्थिक असर यह हुआ कि पैसा अब गरीब किसान या स्थानीय बाजार से निकलकर ड्रग माफिया और बड़ी दवा कंपनियों की जेब में जा रहा है। एक सस्ता और कम हानिकारक विकल्प छीनकर, जनता को महंगे और जानलेवा विकल्पों की ओर धकेल दिया गया है।

​निष्कर्ष: जागो, इससे पहले कि देर हो जाए

​सरकार को अपनी नीति पर पुनर्विचार करना होगा। 'प्रतिबंध' समस्या का हल नहीं है। हमने एक पारंपरिक और कम नुकसानदायक चीज को रोककर एक ऐसे राक्षस को खुला छोड़ दिया है जो हमारी नस्लों को खा रहा है।

​सच्चाई यह है कि डोडा खाने वाला बुजुर्ग आज भी खेत में काम कर रहा है, लेकिन सिंथेटिक ड्रग्स लेने वाला नौजवान श्मशान जा रहा है। अब तय हमें करना है कि हमें 'कागजी आदर्शवाद' चाहिए या 'जमीनी जीवन'                                                             




(Disclaimer):                        


यह लेख केवल सामाजिक जागरूकता और विचार-विमर्श के उद्देश्य से लिखा गया है। लेखक किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों (Narcotics) के सेवन, बिक्री या उत्पादन का समर्थन नहीं करता है। इस लेख का उद्देश्य केवल सरकार की नशा मुक्ति नीतियों के प्रभावों का विश्लेषण करना और सिंथेटिक ड्रग्स के खतरों के प्रति समाज को जागरूक करना है। हम भारत के संविधान और कानूनों का पूर्ण सम्मान करते हैं।




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