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गाँव की आवाज़

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  क्या डोडा-पोस्त पर पाबंदी ने ही खोल दिए 'सिंथेटिक मौत' के दरवाजे? : एक कड़वा सच ​(भारत की नशा विरोधी नीतियों पर एक सीधा सवाल) ​आज हमारे देश के गांवों और शहरों में एक भयानक मंजर आम हो गया है—नौजवानों की लाशें जो पार्कों या सुनसान जगहों पर मिलती हैं, जिनकी बांह में सुई (Syringe) लगी होती है। यह वह पीढ़ी है जो 'चिट्टा', 'स्मैक' और 'सिंथेटिक ड्रग्स' की भेंट चढ़ रही है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि यह दानव हमारे समाज में इतना हावी कैसे हुआ? ​इसकी जड़ें उस फैसले में छिपी हैं, जब सरकार ने बिना दूरगामी परिणाम सोचे 'डोडा-पोस्त' (अफीम की भूसी) जैसे पारंपरिक पदार्थों पर पूर्ण प्रतिबंध (Total Ban) लगा दिया। ​1. मच्छर मारने के चक्कर में सांप पाल लिए ​सालों से हमारे देश का किसान और मजदूर, जो कड़ाके की ठंड और तपती धूप में हाड़-तोड़ मेहनत करता था, वह थकान मिटाने और काम करने की क्षमता बनाए रखने के लिए अफीम या डोडा का सेवन करता था। यह नशा नहीं, उनकी 'खुराक' थी। ​बुजुर्गों का तर्क और प्रमाण हमारे सामने है—डोडा खाने वाला व्यक्ति 80-90 साल की उम्र तक खेतों म...